गुरुवार, 7 जनवरी 2010

शिक्षा प्रणाली , रट्टू पोपट और अंग्रेजी

रट्टू पोपट को हम सब जानते हैं। सृजन और नयी सोच का "खून" करने वाला खतरनाक "रट्टू पोपट" शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने अपने छात्र जीवन में रट्टू पोपट बनने कोशिश करी हो। कुछ बन भी गए होंगे और अबी तक होंगे। ऐसे ही रट्टू पोपटो ने शिक्षा प्रणाली को रट्टू पोपट प्रणाली में तब्दील कर दिया हैं।

भारत में एक बहुत बड़ी बीमारी हैं ----उसका नाम हैं "अंग्रेजी मोह" आजकल माता-पिता - साल के बच्चे को इंग्लिश की वर्णमाला शिशु उपवन जाने से पहले ही सिखा देते हैं। मेहमान भी उनका अंग्रेजी वर्णमाला ज्ञान जाचने में लगे रहते हैं। और सबसे दर्दनाक बात कि आधे से ज्यादा लोगो को तो अंग्रेजी का सही ज्ञान हैं ही हिंदी का।वो हिंगलिश बोलते हैं और बच्चो को भी हिंगलिश बोलना सिखाते हैं। अंग्रेजी सीखना बुरी बात नहीं परन्तु अंग्रेजी के निचे दबकर हिंदी को भूल जाना गलत हैं। हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओ में ज्ञान का अतुल्य भंडार हैं। जाने कितने ही ऐसे हिंदी के लेखक हैं जिन्हें अंग्रेजी में भी महारत हासिल थी। रामधारी सिंह दिनकर, मैथली शरणगुप्त जैसे हिंदी के महान कवियो की अंग्रेजी पर पकड़ थी। यही नहीं
हरिवंशराय बच्चन और भीष्म सहानी तो अंग्रेजी के प्रोफेसर थे।

बात तो रट्टू पोपटो की हैं। जब एक बालक अपनी बात को हिंदी में सुलभता से कह सकता हैं तो उस पर वही बात अंग्रेजी में कहने को कहा जाता हैं। बालक के पास आसान सा रास्ता निकल के आता हैं, रत्तो और उगल डालो। खूब रतिए और परीक्षा में उगल कर जाइये। आपके मार्क्स गए तो कोई नहीं पूछने वाला की कैसे आये। मेरे पड़ोस में एक बच्चा हैं, वो काफी होशियार था और शुरू से हिंदी माध्यम में पढ़ा था। एक साल उसको हिंदी माध्यम से उठा कर अंग्रेजी माध्यम में डाल दिया गया, आसपास कोई अंग्रेजी पढ़ाने वाला था नहीं, बस वही से उसके पतन की कहानी शुरू हो गयी।

अंग्रेजी का दोष नहीं हैं। दोष हैं उस शिक्षा प्रणाली का जो "रट्टू पोपटो की निति" को बढावा देती हैं। शिक्षा मात्र माध्यम की दासी बनकर रह गयी हैं। कार्यकलाप और विज्ञानं के प्रयोग को बढावा नहीं दिया जाता। मुझे याद हैं की परखनली के दर्शन मुझे ग्यारवी कक्षा में हुए थे। हम बच्चो को १० साल तक विज्ञानं पढ़ते हैं और वो भी सिर्फ किताबो में। विज्ञानं के प्रयोगों को दोयम दर्जा दिया जाता हैं। हमे यह बात समझनी होगी कि विज्ञानं प्रयोग पर आधारित हैं कि प्रयोग विज्ञानं पर। आजकल किताबो में परिवर्तन लाया गया हैं, हर पन्ने पर विज्ञानं के प्रयोग करने सिखाये जा रहे हैं। परन्तु कितने शिक्षक अपने छात्रों को विज्ञानं लैब तक लेकर जातें हैं। आलस्य और निक्कमेपन से भरे शिक्षक समितियों के द्वारा सुझाये गए परिवर्तनों और सरकारी नीतियों की पतंग बना करउड़ाते हैं। "रट्टू पोपट प्रणाली" को आगे बढाने में इनका "अमूल्य योगदान" हैं।


मुझे अभी तक याद हैं कि सातवी कक्षा में हमारे विज्ञानं के शिक्षक ने हमें छुट्टियों में किताबो से नक़ल उतरने की बजाय २०-२० पक्षियों के पंख, पेड़ो के पत्ते, फूल जमा करके गत्ते पर चिपकाने का काम दिया था। काम इतना भी आसान नहीं था। सबसे पहले स्कूल के पीछे वाले जंगल में तलाश शुरू हुई। यह तलाश कब यात्रा में तब्दील हो गयीपता ही नहीं चला। घर के आस पास बने पार्को से शुरू होती हुई इंडिया गेट, चिल्ड्रेन पार्क , लोधी गार्डन , क़ुतुबमीनार, दिल्ली चिड़ियाघर, पुराना किला तक मुझे लेकर गयी। इस तरीके से सिर्फ मेरे को दिल्ली में पाए जाने वाले
पेड-पौधों, पक्षियों के बारे में पता लगा बल्कि मेरे इतिहास के ज्ञान में भी बढोतरी हुई। उस समय मेरे पासइन्टरनेट जैसा साधन नहीं था परन्तु ज्ञान की कोई कमी नहीं थी। आजकल बच्चे कही नहीं जाते बस एक क्लिकमारी और इन्टरनेट सब कुछ उगल देता हैं और ज्ञान के नाम पर उनके पास कुछ नहीं हैं। अभी कुछ ही दिनों पहले मैं एक कपडे की दुकान पर गया, दुकानदार के बच्चे वही बैठ कर इन्टरनेट से अपने प्रोजेक्ट के लिए मटेरिअल निकाल रहे थे। तभी एक काम करने वाले ने बच्चे से पूछा ---"लाल किला" कहाँ पर हैं? जवाब मिला --- पतानहीं। दूसरी बार वही सवाल पूछा गया --- "रेड फोर्ट" कहाँ पर हैं? जवाब मिला -- दिल्ली में। तभी पता चला कि शिक्षा माध्यम की दासी बन चुकी हैं।

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