सोमवार, 11 जनवरी 2010

काली यमुना किनारे मैया कैसे जाऊ खेलन

बचपन में एक कविता पढ़ी थी, याद तो नहीं हैं पर उसकी छाप जरुर हैं मन पर। उस कविता में कान्हा अपनी माँ यशोदा से जिद करते हैं कि वे उन्हें यमुना किनारे पर जो कदम्ब का पेड़ हैं उस पर चढ़ने दे। दिल्ली में ही रहने के बावजूद कभी यमुना किनारे ना गया। एक बार चिड़ियाघर गए तो पापा से जिद करी कि यमुना देखनी हैं।

ऐसा तो नहीं था कि नदियाँ नहीं देखी थी। यात्रायों के दौरान जाने कितनी ही नदियों के दर्शन कियें।बिहार में स्वर्ण नदी, कोसी नदी, गंडक नदियाँ और कुछ छोटी नदियाँ देखी इलाहाबाद का संगम भी देखा। फिर मध्य प्रदेश की तरफ गया तो वहां नर्मदा , शिप्रा, चम्बल देखी। ओंकारेश्वर की परिक्रमा के दौरान अनिश्चिता से उमड़ती नर्मदा को छूने का मौका मिला। सच मानिये उसके पानी से मन अब तक गीला हैं। इंदौर में भी एक नदी बहती हैं पर विडम्बना देखिये कि वहां के लोग उसे "खान नाला" कहते हैं। हिमालय की तरफ चला तो बीच में मिल गया मुझे "साड्डा पंजाब" जम्मू जाते हुए मुझे पंजाब के नज़ारे छोड़ना अच्छा नहीं लगता। जाने कितनी ही नदियों पर से रेल गुजरती जाती हैं। दूर खेतो में चलते ट्रक्टर, पानी के पम्प और मस्ती में चरती हुईं भैसें(माफ़ कीजिएगा जो दिखा वही लिख रहा हूँ, गाय के दर्शन कम हुए मुझे), कहीं सूरजमुखी और गेहूं से लहलहाते खेत, यह हैं पंजाब।

नदियों में मुझे विशालता का अनुभव होता हैं। नर्मदा के किनारे जब मैं खड़ा हुआ तो मुझे एक अलग ही अनुभव हुआ। यह मेरी विवशता हैं कि उस अनुभव को मैं शब्दों में नहीं बांध सकता। बंसुरीवाले से यही प्रार्थना हैं कि अगले जन्म मुझे नर्मदा की एक लहर बना दे और वो नर्मदा किनारे आये। उसी पल मैं उसे आगोश में लेकर अपने प्रेम के आसुयों से भीगा दू। बता दूँ कि पिछले जन्म तुझे कितना प्यार किया "बावरी" "सिरिअस" होने की जरुरत नहीं हैं आपको, यह एक फिल्म का दृश्य बता रहा था मैं।

तो फिर पापा ने तो यमुना दिखने से मना कर दिया। मैं भी मानने वाला कहाँ था। एक दिन बैग को हल्का किया और स्कूल से "गोल" हो गया। लोहे के पुल से खड़े होकर यमुना को देखा। सड़ांध और सफ़ेद झाग से भरी हुई यमुना को देख बहुत गुस्सा आया। अभी भी आता हैं। रोज करोडो टन गन्दगी यमुना में उड़ेल दी जाती हैं। इतनी योजनाये बनी। करोड़ो खर्च हो गए पर यमुना काली की काली। दिल्ली में रहकर आप मेट्रो पर गर्व कर सकते हो। बड़े बड़े माल्स और होटल्स आपको याद दिला देते हैं, कि "भइये, यह हैं दिल्ली" सीपी के सेंट्रल पार्क में बैठकर आप रोशनी से जगमगाते वातावरण को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हो पर कभी वही से थोड़ी दूर पर बीमार पड़ी यमुना के बारे में सोचा हैं अपने। नहीं न।

सरकार आखिर इस तरफ ध्यान क्यों नहीं देती। कब तक आप यमुना को साफ़ करने की मुहीम पन्नो में ही रखेंगे। सरकार से ज्यादा गुस्सा तो दिल्ली के लोगो पर आता हैं। हर साल हजारो की संख्या में मुर्तिया यमुना में विसर्जित की जाती हैं। यह सब मुर्तिया प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से बनी होती हैं और इन पर खतरनाक रंगों का भी प्रयोग होता हैं।इन रसायनों और रंगों से पानी में प्रदुषण फैलता हैं। जलजीव और मछलियाँ तो शायद अब यमुना में बचे ही होंगे।

कई लोगो को देखा हैं। यमुना के ऊपर से गुजरते हैं तो हाथ घुमा- घुमा कर पूजा और हवन सामग्री फ़ेंक देते हैं। उसके बाद दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना भी करते हैं। कईं तो दोनों कान भी पकड़ते हैं। अदा हैं यह दिल्ली के लोगो की। नेकी कर दरिया में डाल का सही पालन हो रहा हैं!!!!

घर में रोली आती हैं। उसके थैले पर माँ सरस्वती की तस्वीर बना दी जाती हैं और बड़ी ही "विनम्रता" से "आग्रह" किया जाता हैं कि "इस पाउच को नदी-तालाब में फेक दे" सबसे पहली बात कि पाउच पर आप माँ सरस्वती की तस्वीर मत छापो। रोली लिख दो सिर्फ तो भी व्यक्ति लेगा। यह पाउच प्लास्टिक के बने होते हैं जो नदियों में प्रदुषण ही फैलाते हैं।

अब कोमन वेअल्थ खेलो का आयोजन भी होने वाला हैं पर यमुना अभी भी काली हैं। विदेशी मेहमानों को काली यमुना दिखाओगे। दिल्ली में ओलम्पिक लाने की बातें हो रही हैं। बेहतर होगा उससे पहले यमुना को भी साफ़ कर लिया जाएँ।

नहीं तो कृष्ण यसोदा से यही बोलेंगे "काली यमुना के किनारे मैया कैसे जाऊ खेलन" अब तो कालिया नाग भी नहीं रहता यमुना में। उसका सहोदर हैं प्रदुषण। इससे निकालो यमुना के अन्दर से। यमुना को यमराज की बहिन बताया जाता हैं। अब देख लो आगे।

1 टिप्पणी:

  1. वाकई कालिया नाग का सहोदर प्रदुषण बस गया है यमुना में,,,बढ़िया लेखन!!

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