गुरुवार, 7 जनवरी 2010

किसकी महिमा हो तुम

किसकी महिमा हो तुम
प्रथम किरण की सौम्यता हो तुम
वसंत ऋतू की मोहकता हो तुम
तारक मणियों से सज्जित नभ हो तुम
पर्वतो से गिरते झरनों का संगीत हो तुम
प्रियतमे प्रकृति की महिमा हो तुम

सुन्दर मुख, सौन्दर्य अनुपम हो तुम
नीलकमल मृगनयनी हो तुम
षोडश श्रिंगार करे भाग्यलक्ष्मी हो तुम
तरुनी कोमल कलि हो तुम
प्रियतमे रूप की महिमा हो तुम

मधुर भावनाओ की तस्वीर हो तुम
वारुनी की मादकता हो तुम
हरे पल्लवों पर जमी ओस हो तुम
इस हृदय की कविता हो तुम
प्रियतमे प्रणय की महिमा हो तुम

वृस्तित गगन में गूंजता स्वर हो तुम
सात सुरों का एक सुर हो तुम
हृद्यांगन का प्रेम भरा गान हो तुम
अन्नत काल से लगा ध्यान हो तुम
प्रियतमे, जीवन की महिमा हो तुम

अंधकारमय जीवन का प्रकाश हो तुम
मेरे स्वप्नों का आकाश हो तुम
मरुस्तल में जल का आभास हो तुम
प्राणों का आधार, प्रणयनी हो तुम
प्रियतमे प्रबल भाग्य की महिमा हो तुम

प्रणय निवेदन स्वीकार करो तुम
सिन्धु तृष्णा को समाप्त करो तुम
शरणागत को शरण दे, उद्दार करो तुम
मेरे अमिट प्रेम का एहसास करो तुम
प्रियतमे तब जानेगा जगत कि किसकी महिमा हो तुम


©Yashwant Mehta

2 टिप्‍पणियां:

  1. शरणागत को शरण दे, उद्दार करो तुम
    मेरे अमिट प्रेम का एहसास करो तुम
    प्रियतमे तब जानेगा जगत कि किसकी महिमा हो तुम
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति धन्यवाद और शुभकामनायें

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  2. बहुत सुन्दर भाव एवं अभिव्यक्ति!!

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