मंगलवार, 26 जनवरी 2010

आलोचना एक कडवा अमृत

आलोचना एक कडवा अमृत हैं जो एक व्यक्ति की सोच और शैली में निखार लाता हैं। मैं आलोचना को एक शुभचिंतक द्वारा करा गया उत्थानकारी प्रयास मानता हूँ। प्रशंसा का ढोल पीटने वाले और नाक-भौं सिकोड़ने वाले तो हर गली में मिल जायेंगे परतु एक सच्चे आलोचक और शुभचिंतक का मिलना दुर्लभ हैं। यह सच्चा आलोचक व्यक्ति को यु ही नहीं मिलता।
मेरा मानना हैं कि उस निंदक की पहचान भी हमे ही करनी पड़ती हैं। हमे सीखना पड़ता हैं कि कौन शेर की खाल में छुपा भेड़िया हैं और कौन असली शेर।

जीवन का संगर्ष एक दलदल होता हैं जिसमे अन्दर जाने पर दम घुटता हैं और बहार आने पर बदबू साँस लेना दूभर कर देती हैं, ऐसे स्थिति में अगर यह सच्चा आलोचक मिल जाये तो व्यक्ति उसी दलदल में कमल बन खिल उठता हैं

1 टिप्पणी:

  1. यशवंत जी बहुत सुंदर और सटीक बात कह दी आपने , आपको एक सूचना भी देता चलूं अगली बैठक रविवार सात फ़रवरी को होनी तय हुई है पूरी जानकारी आज की पोस्ट में है और मेरा नं तो आपके पास है ही , आपसे पहले ही बात हो चुकी है उम्मीद है मुलाकात होगी
    अजय कुमार झा

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