बुधवार, 13 जनवरी 2010

सहित्य-रचना की धूप में वो पक गया आम के अचार सा

कवि ने खर्च कर डाली ज़िन्दगी सारी
हम सुने किसी की, कोई सुन ले हमारी

जवानी में मधुर रचनाये रच एक कवियत्री पटाई थी
शादी के बाद हर नयी कविता सुनाने पर बस लाते ही खाई थी

प्रकाशकों के चक्कर काट, हर बार लौट आया लाचार सा
सहित्य-रचना की धूप में वो पक गया आम के अचार सा

कभी कभी रचनाये कुछ "बड़े कवियों" के नाम से छाप जाती थी
एक कोने में खड़ा गम-गुल्ले खाता था जब दुनिया ताली बजाती थी

पागल अकेला घुमा वो दुनिया के बाज़ार में
मरते वक़्त कफ़न भी नहीं मिला उधार में

कहता "फकीरा", उस मालिक महान से
क्या यही "रेस्पेक्ट" हैं "कवियों" के तेरे जहां में

©Yashwant Mehta






2 टिप्‍पणियां:

  1. जवानी में मधुर रचनाये रच एक कवियत्री पटाई थी
    शादी के बाद हर नयी कविता सुनाने पर बस लाते ही खाई थी

    ha..ha.. umdaa!!!

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