मंगलवार, 19 जनवरी 2010

अरे कोई डंडा दो इस इश्क को पीटना हैं

अरे कोई डंडा दो
इस इश्क को पीटना हैं
बहुत घसीटा इसने मुझको
अब इसको घसीटना हैं

रोज रात छत्त पर लेकर जाये
और चंदा हमे दिखाए
चंदा को देख हम रोने लग जाये
यह किनारे-बाम बैठकर भुट्टे खाए

बेवफाई से दुश्मनी हैं इसकी
उसके चर्चे हर दम इसकी जुबान पर
शराबी आता हैं रोज हाथ में जाम लेकर
पिलाये मासूम दिल को बेवफा के नाम पर


मौत आती नहीं इसको कभी
नहीं तो जहर पिला देते
कटता नहीं किसी कटार से
नहीं तो कसाई की दुकान पर बेच आते

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