रविवार, 10 जनवरी 2010

ऑस्ट्रेलिया बन रहा हैं मौत का कुआँ भारतीय छात्रों के लिए

नितिन गर्ग , जसप्रीत सिंह, रणजोध सिंह --- आखिर इन सब में समानता क्या हैं? यह सब भारतीय हैं , ऑस्ट्रेलिया गए थे अपने सपनो के साथ और फिर यह शिकार बन गए।
किसका शिकार?

रंगभेद का या फिर किसी सड़कछाप मवाली का। ऑस्ट्रलियन सरकार तो कह रही हैं कि यह सब लोग शरारती तत्वों के शिकार हैं। यह जो "शरारती तत्त्व" हैं, यह "शरारत" क्यूँ कर रहे हैं। ऑस्ट्रलियन सरकार से हमारी मांग हैं कि इन "शरारती तत्वों" का प्रकार बताये और यह ऐसा क्यूँ कर रहें हैं, इसका भी कारण बताया जाएँ।

पिछले कईं वर्षो में ऑस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों की संख्या बढ़ी थी। भारतीय छात्रों ने ऑस्ट्रलियन जीडीपी में प्रतिवर्ष १५ मिलियन $ का योगदान किया। भारतीय छात्रों के प्रति बढ़ते द्वेष के कारण ऑस्ट्रेलिया जाने वाले छात्रों की सख्या में कमी आ रही हैं। आखिर कौन माँ-बाप अपने बच्चो को मौत के कुएं में भेजेगा? विक्टोरिया में पिछले एक वर्ष में १४४७ भारतीयों पर हमले हो चुके हैं। डॉ मुकेश हैकरवाल विक्टोरिया में रहते हैं ,सितम्बर २००८ में एक हमलावर ने उन पर बल्ले से आक्रमण किया। डॉ साहब कईं महीनो तक बिस्तर से नहीं उठ पाए , उनके दिमाग की शल्यक्रिया हुई। नितिन गर्ग की हत्या चाकू गोदकर कर दी गयी।

इसके बाद भी ऑस्ट्रलियन सरकार कहती हैं कि यह हमले नसलवादी नहीं हैं। ऑस्ट्रलियन अधिकारी अब भी ऑस्ट्रेलिया को भारतीयों के लिए सुरक्षित जगह बता रहे हैं। भारतीय सरकार ने सलाह के पन्ने तो निकल दिए हैं पर उससे स्थिति में कोई फरक नहीं आने वाला।

ऑस्ट्रेलिया से विचार विमर्श करते हुए काफी समय गुजर चूका हैं। भारतीय सरकार को इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच तक लेकर जाना चाहिए। सयुंक्तराष्ट्र संघ पर भी इस मामले में एक्शन लेने के लिए दवाब बढाया जाना चाहिए। ज्यादा देरी ऑस्ट्रेलिया में रह रहे भारतीयों लोगो के हित में नहीं होगी। आज ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों की स्थिति गाँधी जी के समय के दक्षिण अफ्रीका से कम नहीं हैं। अब देखना यह हैं की यहाँ गाँधी जी की तरह मानवाधिकारों के लिए कौन संघर्ष करता हैं।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आर्थिक दबाव ऐसे समाजिक नैराश्य को परिलक्षित करते हैं...इस प्रकार की प्रवृत्तियां सरकारों के बूते से बाहर की चीज़ होती हैं..इनका कोई दमनात्मक उपचार नहीं होता है

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  2. यशवंत भाई अभी किसी क्रिकेटर को कुछ कह दिया होता तब देखते कितना हल्ला हो रहा होता , जो मर रहे हैं वे आम आदमी हैं और सरकार हमारी इन मामलों में कब मजबूत रही है जो उससे अपेक्षा की जाए
    अजय कुमार झा

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