शनिवार, 9 जनवरी 2010

काका बहुत याद आते हैं

हिंदी हास्य कविता जगत के सातवे आसमान पर विराजमान श्री प्रभुनाथ गर्ग को हम सब लोग किस नाम से जानते हैं --- जी हाँ, अपने प्यारे काका हाथरसीराजनीति और सरकारी तंत्र की खामियों को काका मजाकिया अंदाज में बोल डालते थे। शब्दों का खेल खेलने में माहिर काका की कविताये जहाँ श्रोतायों और पाठको को हंसा हंसा कर लोटपोट कर देती हैं वहीँ मन के ऊपर गहरा असर डालती हैंयह व्यंगात्मक अंदाज कहीं पर गरीबी और गरीबो की उपेक्षा को भी सामने लाता हैंदिन प्रतिदिन सुरसा के मुख की भांति बढती हुई महगाई पर काका कैसे तीखे व्यंग तीर चलाते हैं ----

जन - गण - मन के देवता , अब तो आँखें खोल
महँगाई से हो गया , जीवन डाँवाडोल
जीवन डाँवाडोल , ख़बर लो शीघ्र कृपालू
कलाकंद के भाव बिक रहे बैंगन - आलू
कहँ ‘ काका ' कवि , दूध - दही को तरसे बच्चे
आठ रुपये के किलो टमाटर , वह भी कच्चे

वह कितने सरल भाव में काका ने बात कह डालीउनके व्यंग में दर्शन भी हैंकाका अपने व्यंग को बोलते थे ---- काका की फुलझड़ियाँ, पर यह तो वो बम हैं जो विस्फोट कर देबीते साल जब भारत ने चाँद पर चंद्रयान प्रथम भेजा तो कई बुद्धिजीवियो और चिंतनकारो ने इस बात पर आपात्ति उठाईवैज्ञानिक खोज और रिसर्च पर करोडो रूपये खर्च करना सही हैं परन्तु हमने फिल्ड गलत चुनाभारत जैसे देश में जहाँ ७७ प्रतिशत जनता १६ रूपये प्रति माह की मामूली सी आय पर गुजारा करती हैं(२००४-०५ के गरीबी आंकड़ो पर आधारित) , वहां हमारी प्राथमिकता चंद्रयान भेजने की होनी चहिए या गरीबी के स्तर को घटने कीजरा देखिये काका बहुत पहले ही इस बात को कह गए

ठाकुर ठर्रा सिंह से बोले आलमगीर
पहुँच गये वो चाँद पर, मार लिया क्या तीर?
मार लिया क्या तीर, लौट पृथ्वी पर आये
किये करोड़ों ख़र्च, कंकड़ी मिट्टी लाये
'काका', इससे लाख गुना अच्छा नेता का धंधा
बिना चाँद पर चढ़े, हजम कर जाता चंदा


अभी अभी तेंदुलकर समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार के सौंपी हैं। इस समिति ने कैलोरी काउंट की बजाय आय को गरीबी स्तर का पैमाना बनाने को कहा हैं। ऐसा मन जा रहा हैं की अगर इस सुझाव को अनुमोदन मिल जाता हैं तो भारत में गरीबो की संख्या ३८ प्रतिशत तक बढ़ जाएगी।

आखिर मुझे काका इतने याद क्यूँ आते हैं। इसका एक और उदहारण देता हूँ। इस सच से कोई अनभिग्य नहीं कि ऍमसीडी में कितना भ्रस्ताचार हैं। पिछले दिनों इस संस्था में नकली कर्मचारियों का पता लगा। सरकार ने कदम उठा लिए नहीं तो और पता नहीं कितने सालो तक करोडो रूपये की चपत लगती रहती। देखिये प्यारे काका ने कितना मजेदार व्यंग कस डाला था अपने जीवनकाल में।

पार्टी बंदी हों जहाँ , घुसे अखाड़ेबाज़
मक्खी , मच्छर , गंदगी का रहता हो राज
का रहता हो राज , सड़क हों टूटी - फूटी
नगरपिता मदमस्त , छानते रहते बूटी
कहँ ‘ काका ' कविराय , नहीं वह नगरपालिका
बोर्ड लगा दो उसके ऊपर ‘ नरकपालिका '


सरल सी भाषा में हंसा हंसा कर गहरी बातें करने वाले काका का कहना था की व्यंग वो नश्तर हैं जो समाज के गले-सड़े अंगो की शल्य क्रिया करता हैं। काका ने हर तंत्र की कमी पर फिकरे कसे। कॉलेज में मौज उड़ाते छात्रों पर उन्होंने जो लिखा वाकई सच हैं। एक झलक देखे जरा


फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸
लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।
कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸
दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।
कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸
मौज कर रहे पुत्र¸ हडि्डयां घिसते फादर।


देखिये प्रकृति का कमाल काका दुनिया से गए तो भी हंसकर। मौज-मस्ती के आलम में खोया यह फकीर अपने जन्मदिन पर इस दुनिया से गया। सुना हैं कि काका का आदेश था कि कोई भी अंतिम संस्कार के समय रोयेगा नहीं। सब हँसते हँसते काका को लेकर गएँ। हम हिन्दुस्तानियो की परंपरा हैं कि हम महान आत्माओ को सिर्फ उनके जन्मदिन अथवा पुण्यतिथि के अवसर पर ही याद करते हैं। मुझे इस परम्परा से घृणा हैं। अरे याद करना हैं तो अवसर कि क्या जरुरत।


काका का स्टाइल आज भी कईं लोग अपनाते हैं। पर काका तो काका हैं। मेरा मन करता हैं कि अगर कहीं काका दिख जाये तो उनकी दाड़ी के बाल खीच लू। उनके गले लग जाऊं और पुछु कि आप वापस कब आओगे हम सबको हँसाने के लिए। आज भी इस देश को आप जैसे हास्य कवियों कि सख्त जरुरत हैं।


काका के चरणों में समर्पित

यशवंत मेहता








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