शनिवार, 16 जनवरी 2010

शराब कब से बोतल में बंद पड़ी हैं.......अब वो मजा नहीं रहा पीने में.....

जालिम.....
दिल भर सा गया हैं अब तो जिंदगी से....जीने की तम्मना और नहीं सीने में...
शराब कब से बोतल में बंद पड़ी हैं.......अब वो मजा नहीं रहा पीने में.....

जालिम.....
तेरे नूर ने तो अँधा ही कर दिया था.....कुछ कदम न चला तो बच गया गिरने से
तेरी चाहत ने दिल को छलनी इतना करा हैं....अब तो डरता हूँ तुझे ज़ेबा कहने से

जालिम....
नदी का किनारे पर मेरी नाव क्या अटकी.....अटकी ही रह गयी
मैं तो बस देखता ही रह गया.....सब चले गए आगे....मेरी उम्र गुजरती रही उन्हें देखने में

जालिम.....
किस्मत तुने ऐसे लिखी.....सय्याद भी डरता हैं उसे पढने से
मैं तो जी रहा हूँ हर पल इस किस्मत को......दिनों का सफ़र ख़तम होगा महीनो में

जालिम.....
इतना जुल्म अब मुझ गरीब पर न दिखा.....अदू हैं या दोस्त इतना बता
कभी तो मेरे गुलशन को भेज सबा......पिला हयात या कर दे फ़ना

©Yashwant Mehta


2 टिप्‍पणियां:

  1. शराब कब से बोतल में बंद पड़ी हैं.......अब वो मजा नहीं रहा पीने में.....
    ये मानसिक हलचल की चंद घड़ी है......गर साकी साथ हो बहुत मजा है गम पीने मे।

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