रविवार, 24 जनवरी 2010

सरल भाषा कहिये न क्यूँ हर विषय को इतना पकाऊ बना देते हैं लोग

आखिर सरल भाषा में कोई बात कहने से कईं लेखक क्यूँ कतराते हैं। कईं बार मैं कोई लेख पढता हूँ अथवा कोई पुस्तक पढता हूँ तो ऐसा लगता हैं कि शायद यह विषय सरल भाषा में कहा जा सकता था। मेरा मानना हैं कि सरल भाषा में कही गयी बातें ज्यादा लोगो तक पहुचती हैं और उनका असर भी गहरा होता हैं। परन्तु दार्शनिकता और मौलिक चिंतन की लाठी पकडे कई लेखक असल विषय से भटकते नजर आते हैं। बुद्धिमता के प्रदर्शन की गधा दौड़ में लेखक असल विषय का राम नाम सत्य कर देते हैं।

दर्शन के बारे में इतना ज्ञान तो नहीं परन्तु कईं जगह लेखक रट्टू पोपट की तरह पुरानी बातें ही लिखते नजर आते हैं। वाहवाही भी खूब होती हैं। ऐसे लेखक हमेसा चस्मा लगाकर गंभीर सी मुद्रा में सिगरेट फूकते नजर आते हैं। प्रशंसक भी मिलते हैं तो वो जो मुशायरे में पहुचकर हर शेर पर वाह वाह करते हैं। संस्कृति और धर्म की चुइंगम चबाते यह रट्टू पोपट हमेसा एक दुसरे की खाल खीचने में लगे रहते हैं। खुद ही देख लो मार्केट खुल्ला हैं यार।

आखिर क्यूँ परहेज करते हैं यह लोग सरल भाषा में लिखने से। अरे भैया, एक लेखक का मकसद होता हैं अपनी बात को जनमानस तक लेकर जाना, तुम तो फस जातें हो इन इनामो में। जनमानस कब तक तुम्हारे घटिया दर्शन की घुट्टी पिएगा। बंद करो और सरल भाषा में लिखो।

गंभीर लेखको, अगर यह लेख घटिया लगे तो चार-पांच गाली देना और अपने दर्शन में खो जाना।

2 टिप्‍पणियां:

  1. हमारा भी यही मानना है कि शब्दाडाम्बर न रचते हुए लेखन में भाषा ऎसी होनी चाहिए कि जिसे एक आम पाठक भी समझ सके....अब हर कोई तो दार्शनिक,बुद्धिजीवी नहीं हो सकता!

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  2. सरल भाषा में बात समझने में सरलता तो होती है. सहमत!

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