रविवार, 10 जनवरी 2010

फेसबुक ब्रा कलर अभियान --- कितना सही कितना गलत

फेसबुक पर गए हफ्ते एक जोरदार अभियान चला। स्तन कैंसर के बारे में जागरूकता फ़ैलाने के उदेश्य से चलाया गया यह अभियान कब एक "वायरल फीवर" की तरह पूरे फेसबुक पर फ़ैल गया पता ही नहीं चला।इस अभियान के तहत महिलाओ ने अपनी अपनी ब्रा के रंग को स्टेटस मेसेज बना कर अपडेट करना शुरू कर दिया। यह अभियान इस तरीके से चलाया गया कि पहले तो पुरुष सर खुजाते रह गए और जब उनको रंग के स्रोत का पता लगा, तो दंग रह गए।भारतीय महिलायों और किशोरियों ने भी इस अभियान में हिस्सा लिया। नवभारत ने यह खबर मुख्य पृष्ट पर छापी। आज के अंक में नवभारत ने बताया कि उन्हें मेल और मेसेज करने वाले लगभग सभी पाठको ने नैतिकता और संस्कृति की दुहाई देते हुए लिखा हैं कि उन्हें(पाठको को) इस बात से धक्का लगा हैं।

महिलायों को मिलने वाला जो सन्देश मिल रहा था वो ये था

"Some fun is going on.... just write the color of your bra in your status Just the color, nothing else. It will be neat to see if this will spread the wings of breast cancer awareness. It will be fun to see how long it takes before people wonder why all the girls have a color in their status... Haha ."


इस सन्देश को एक बार पढने से ही पता चल जाता हैं कि असल बात क्या थी। क्या सिर्फ रंग बता देने से किसी कोस्तन कैंसर के जानकारी मिल जाएगी? बहुत सी महिलायों ने रंग तो बता दिया परन्तु उनको स्तन कैंसर के बारे मेंकुछ नहीं पता चला। एक भद्दा मजाक किया गया और आधुनिक कहलाने की होड़ में सब इसमें शामिल होते गए। खुद को एक आधुनिक प्रोडक्ट के रूप में पेश करने की इस अंधी दोड में असली मकसद मीलो पीछे छूट गया।

नैतिकता और संस्कृति का पतन तो और भी कई कारणों से होता हैं परन्तु स्तन कैंसर जैसे भयानक बीमारी केनाम पर इस तरीके का भद्दा अभियान चलाना सम्पूर्ण नारी जाति का अपमान हैं। और उससे भी शर्मनाक बात येहैं कि नारी जाति के सम्मान की धज्जियाँ स्वयं नारी ने उड़ाई।

अगर अभियान चलाना ही था तो स्तन कैंसर के ऊपर जानकारी वाले विडियो डाले जाते और उनके लिंक को एकदुसरे को भेजा जाता। पर ऐसा हो तब न, आधुनिकता के जाल में नैतिकता और संस्कृति को तो पहले ही पातालकी गहराईओं में धकेला जा चूका हैं और अब जो हो रहा हैं वो सबके सामने हैं।

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