बुधवार, 6 जनवरी 2010

मेरे हिंदी प्रेम की कहानी

यह पल मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं जब मैं हिंदी ब्लॉग जगत में कदम रख रहा हूँहिंदी हमेशा से दिल के करीब रही हैं परन्तु यह मेरा दुर्भाग्य हैं कि दसवी कक्षा के बाद हिंदी पढने का मौका ही नहीं मिला स्नातक में गणित का साथ पकड़ लिया

आज
भी मुझे महाविद्यालय का प्रथम दिन याद हैं जब किसी ने मुझसे अपने विषय को हिंदी में बोलने को कहामैंने तत्काल ही उत्तर दिया --- स्नातक(वरिष्ट) गणित प्रथम वर्ष, वो पल ऐसा था जिसमे मुझे अपने हिंदी पढने पर गर्व हुआ । उसी पल मन में ठान ली कि स्नाकोतर करूँगा तो सिर्फ हिंदी में अन्यथा नहीं, परन्तु यह संकल्प तब समय के साथ दिल के किसी कोने में गुम हो गया और स्नाकोतर में भी गणित के दुसरे रूप का साथ पकड़ लिया

बचपन में जनसत्ता के दर्शन होते थे कोमल मन जनसत्ता को कहाँ से समझ पाता सो माताजी ने हमारे लिए चम्पक लगवा दी वो भी अंग्रेजी मेंचम्पक को पढना और भार्गव के हिंदी-अंग्रेजी कोश के पन्ने पलटना बहुत अच्छा लगा क्यूंकि अंग्रेजी ज्ञान में बढ़ोतरी हो रही थी और नित नयी कहानिया भी पढने को मिल रही थीहमारी अंग्रेजी तो अच्छी हो ही रही थी और हिंदी का एक नया संसार भी बन रहा था मन के भीतर अपने आप रचित हो रहा था

उस ज़माने में देल्ही में साउथ ब्लाक के पास दिल्ली परिवहन निगम का केंद्रीय टर्मिनल हुआ करता था जहाँ पर काफी अच्छा पटरी बाजार लगता था, वहीँ पर एक हिंदी बालपत्रिका के दर्शन हुए----नाम था --- नंदन। फिर कुछ दिनों बाद एक और बालपत्रिका पढने का शौक हुआ ---चंदामामा हिंदी पत्रिकाओ का साथ भी बस वही तक रहा

मैंने हिंदी और अंग्रेजी लेखन कभी भाग नहीं लिया परन्तु विद्यालय में हिंदी और अंग्रेजी के अध्यापको का स्नेह मुझ पर निरंतर बरसाउस बारिस से मेरे मन की माटी अभी तक गीली हैं जिसकी भीनी-भीनी सुगंध आज भी मेरे मन को महकाती हैंहिंदी अध्यापको का स्मरण आज भी प्रशंसा के पलो को ताजा कर देता हैंसातवी कक्षा में जब मैंने "परिपक्व" का प्रयोग एक वाक्य में किया तो अध्यापिका ने मेरे माता-पिता को विद्यालय में बुलाकर मुझे अच्छे प्राइवेट विद्यालय में डालने का सुझाव दियाएक ऐसे ही और ख़ुशी के अवसर का स्मरण होता हैं जब "सतपुड़ा के घने जंगल" की व्याख्या करने पर मुझे अध्यापक ने गले से लगा लियावो कोमलता, वो स्नेह जाने कहाँ खो गया हैंकभी कभी मन करता हैं कि वो पल फिर से वापस जाये

कुछ ऐसे ही कोमल पल अंग्रेजी अध्यापको से भी मिलेश्री ऋषि नारायण अरोर्दा जिनसे हमने साल तक अंग्रेजी सीखी वे आज भी मन के पटल पर विराजमान हैं भाषा-प्रेम को प्रोत्साहित करने वाले श्री अरोरा ने हमेसा जीवन की बारीकिया हास्य-व्यंग के रूप में हम सब के सामने रखीवे एक सेवानिवृत फौजी थे जो अपने अनुशासन-प्रेम के कारण कुख्यात भी थेउनसे जुड़े कईं किस्से आज भी ज्यों के त्यों मेरे ह्रदय में सुरक्षित हैंआने वाले दिनों में उनके ऊपर भी लिखूंगा

शरद जोशी के हास्य-व्यंग के एक कालम का नाम में भूल गया हूँबचपन में नवभारत में उन्हें पढने अवसर भी मिलाप्रेमचंद का नाम जब सुना तो पुस्तकालय में उनकी लिखी किताबे खूब चाटीउनकी एक कहानी से सीख मिली कि कलम कि ताकत सबसे बड़ी ताकत होती हैंइन सबके बीच कई महान लेखको और कवियों को पढने का अवसर मिला जिनमे प्रमुख हैं मोहन राकेश, मन्नू भंडारी, रामधारी सिंह दिनकर, कुंवर नारायण, महामानव निराला, महादेवी वर्माकाव्य कला मे महामानव निराला और मधुविक्रेता हरिवंशराय बच्चन ने बहुत प्रभावित किया हैं। "सरोज स्मृति" को पड़ा तो हृदय रोने लगा। रचना "मधुशाला" किस हिंदी काव्य प्रेमी ने नहीं पड़ी होगी७५ की मधुशाला आज भी पोद्शी हैं

मुझे भी हिंदी की सेवा का अवसर मिले इससे बड़ी बात मेरे लिए क्या होगीइस ब्लॉग का उदेश्य ही हिंदी की सेवा और जागरूकता कि युग क्रांति लाना हैं।

4 टिप्‍पणियां:

  1. हिन्दी ब्लॉग जगत को भी अब अपने संस्पर्श से समृद्ध कीजिये -सुस्वागतम !

    उत्तर देंहटाएं
  2. भारत में ऐसे ही असंख्य हिन्दीप्रेमी भरे पड़े हैं किन्तु अधिकांश निष्क्रिय और सुसुप्त हैं।ुनमें से एक छोटी संख्या भी जाग जाय तो हिन्दी का कल्याण सुनिश्चित है।

    हिन्दी में ब्लागकारी आरम्भ करने पर बधाई और शुभकामनाएँ!

    हो सके तो हिन्दी विकिपिडिया पर भी कुछ लेखों का योगदान करें। गणित पर लिखने के लिये बहुत कुछ बाकी है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अरविन्द जी,स्नेह और प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद्
    हिंदी ब्लॉग जगत में पहला कदम रखते ही आप सबका जो स्नेह मुझ पर बरसा हैं वो मुझे लिखने के लिए हमेसा प्रेरित करता रहेगा| हिंदी लेखन में नया होने के कारण, त्रुटियों की सम्भावना हैं| कृपया मार्गदर्शन कीजियेगा|

    साभार
    यशवंत मेहता

    उत्तर देंहटाएं
  4. अनुनाद जी, स्नेह और प्रोत्साहन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद्|
    आशा करता हूँ कि आप सभी मेरे ब्लॉग पर आते रहेंगे और मेरा उचित मार्गदर्शन करेंगे| मुझे सहर्ष हिंदी विकिपीडिया में योगदान के लिए तैयार हूँ| गणित को हिंदी में सहर्ष लिखना चाहूँगा | आपका कथन एक दम सही हैं, निष्क्रियता ही पतन की जननी हैं| हम अंग्रेजी में बोलना और लिखना शान समजते हैं परन्तु हिंदी में कमजोर होते जा रहें हैं| हिंदी के अख़बार भी अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करते हैं| कुछ शब्दों का प्रयोग मान्य हैं परन्तु अधिकता हानिकारक हैं|

    हिंदी का गौरव हमेशा बना रहेगा

    साभार
    यशवंत मेहता

    उत्तर देंहटाएं