सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

मेरा मुट्ठी भर आसमान......फिर फिसल गया

उड़ते हुए पंछी को काला बादल निगल गया
मुट्ठी भर आसमान......फिर फिसल गया

मरुस्थल में मृग फिर प्यासा ही मर गया
सपनो का किला......फिर रेतीला हो गया

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