मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

अरे कमीने.....तेरा सत्यानाश हो.....दूध जलवा दिया तुने!!!

आज धुप अच्छी खिली हुई हैं। चटाई लेकर मैं छत पर पंहुचा। आज आलू-मेथी की सब्जी और परांठे खाने को मिले। सब्जी में लहसुन ज्यादा डल गया था परन्तु स्वाद भी बढ़ गया था। अख़बार खोला। एक खबर कहती है कि आने वाले दिनों में दूध के भाव बढ़ जायेंगे

कभी मैं रूपये लीटर दूध लेकर आता था। आज ३० रूपये लीटर रहा हैं। महंगाई बढ़ गयी हैं। चीनी-दूध सबमहंगा होता जा रहा हैं। चाय जो - रूपये में जाती थी अब रूपये की मिल रही हैं और वो अभी पानी जैसी।

खपत भी बढ़ गयी हैं और आराम भी बढ़ गए हैं। तनख्वाह भी बढ़ गयी हैं और शौक भी बढ़ गए हैं। सब कुछ बढ़गया हैं। मोटापा भी बढ़ गया हैं और मधुमेह भी बढ़ गया हैं।

कारे
भी बढ़ गयी हैं। जनसँख्या भी बढ़ गयी हैं। शिक्षा भी बढ़ गयी हैं। बेरोजगार भी बढ़ गए हैं। सब कुछ बढ़ गया हैं।

मन की दहकती भट्टी पर दिमाग के पतीले में सवाल उबलने लगे। उबलते सवालों ने विचारो को खुल्ले आकाश में छोड़ दिया और मैं आंखे बंद कर चिंतन में डूब गया। गुनगुनाती धुप ने भी मेरा साथ दिया।

एक आवाज ने मेरी समाधी भंग कर दी।

निचे से आवाज आई.......अरे कमीने.....तेरा सत्यानाश हो.....दूध जलवा दिया तुने!!!

मुझे बोला गया था की दूध चूल्हे(गैस के.....) पर गरम हो रहा हैं, उबल जाने पर चूल्हा बंद कर दू। दूध की खबर ने दूध जलवा दिया। महंगाई के चिंतन ने कमीना बना दिया

3 टिप्‍पणियां:

  1. कम से कम अब तो हम महिलाओं की सोंचे .. जो चिंतन में भी चूल्‍हे में चढे सामान की चिंता में होती हैं !!

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