गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

....किसी कंजूस की पत्नी हो तो ऐसी.....


एक आदमी ने अपने जिंदगी में खूब रुपया-पैसा कमाया। पर एक नंबर का कंजूस-मक्खीचूस। उससे सबसे ज्यादा प्यार रूपये से ही था। उसकी इस आदत के कारन उसकी पत्नी बहुत परेशान थी। इतना रुपया होने का बावजूद भी वो एक-एक रूपये के लिए मोहताज थी। वो श्रृंगार वाटिका जा पाती थी, ही उसको अच्छे गहने पहनने को मिलते थे। उसकी सहेलियां भी उसका खूब मजाक बनाती थी।

फिर भी पत्नी बिना किसी शिकायत के पति की जी-जान से सेवा करती थी। एक दिन कंजूस बीमार पड़ गया। खूबदवा-दारू हुई पर वो ठीक नहीं हो पाया। और एक दिन उसका अंतिम समय गया। उसकी पत्नी ने उसकी अंतिमइच्छा जाननी चाही।

वो बोला --- प्रिये, मैंने पूरा जीवन धन कमाने में लगा दिया, मैंने इतना धन किसके लिए कमाया ---- अपने लिए, मेरी मृत्यु के बाद तुम सारी सम्पति बेच देना और सारा धन एक लकड़ी के बक्से में डालकर मेरी चिता के साथ जला देना। मैं इस धन को स्वर्ग में जाकर खर्च करूँगा। यही मेरी अंतिम इच्छा हैं।

पत्नी पतिव्रता थी। उसने ऐसा करने की हामी भर दी। उसने एक लकड़ी का बड़ा बक्सा बनवाने का आर्डर दे दिया।कुछ दिनों बाद कंजूस मर गया। उसकी इच्छानुसार पत्नी ने उसकी चिता के साथ वो लकड़ी का बक्सा भी जलवा दिया।

पत्नी की एक सहेली को जब यह बात पता चली तो वो अफ़सोस जताने उसके पास आई। वो बोली -- अरे तू तो बड़ी बेवकूफ निकली, तुने सारा रुपया बक्से में भर के उस कंजूस की चिता के साथ जलवा दिया।

तो पत्नी बोली --- अरी नादान, मैंने उस बेवकूफ के मरने के बाद सारी सम्पति बेच दी और सारा रुपया अपने बैंक अकाउंट में डलवा दिया। फिर मैंने सारे रूपये का एक चेक बना कर उस बक्से में रखवा दिया। अब वो चाहे तो स्वर्गके बैंक से वो रुपया कैश करा ले। मैंने तो अपने धर्म का पालन कर दिया।


(यह लघुकथा मुझे ईमेल से मिली थी , जिसमे मैंने थोडा सा बदलाव करके हिंदी में प्रस्तुत करा हैं। यह जिस व्यक्ति(अज्ञात) की मूल रचना हैं उसके प्रति में आभार व्यक्त करता हूँ)

9 टिप्‍पणियां:

  1. यह लघुकथा दैनिक भास्‍कर में सण्‍डे की पाठशाला शीर्षक के अन्‍तर्गत प्रकाशित हुई थी, आप इसे साभार लिखेंगे तो साहित्‍य के साथ न्‍याय होगा।

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  2. डा श्रीमती अजित गुप्ता
    मुझे यह रचना ईमेल से प्राप्त हुई और इसके लिए मैं मूल रचनाकार का आभारी हूँ। रचनाकार कौन हैं मुझे नहीं पता। और यह रचना अंग्रेजी में थी। इस प्रकार के व्यंग इतने लोकप्रिय हो जाती हैं कि वे कहीं भी, किसी भी रूप में आपको मिल जाएँगी। चुटकुलों और अत्यंत लोकप्रिय व्यंग के मूल रचनाकारों की खोज आसान नहीं होती। चुटकुले और लोकप्रिय व्यंग संसार के एक भाग से दुसरे भाग में पहुच जातें हैं।

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  3. वाह! मान गए पत्नी की बुद्धि को!
    घुघूती बासूती

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  4. मेह‍ता जी, आप इसे ऐसा ही लिखे कि मैंने इन्‍टरनेट पर पढ़ी थी। अभी ऐसा लग रहा है कि जैसे आपकी ही रचना हो। मैंने एक सुझाव दिया है आप माने या न माने आपकी इच्‍छा।

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  5. प्रिय यशवन्त जी,
    इतनी प्रेरणादायी कहानी हमसे शेयर करने के लिए बहुत बहुत आभार।

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  6. कथा जिसकी भी है बड़ी दिलचस्प...मैंने सोच लिया है आज से जो खर्च करना है अपने ऊपर आज से ही शुरू कर दूंगा...पत्नी को बैंक ऑफ गॉड के चेक दे दिया करूंगा...

    जय हिंद...

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