बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

कुत्ते बहुत भोंक रहे हैं, शायर को लिखने नहीं देते ......(यशवंत मेहता)

अधजले कोयले सी सुलगती यह काली रात
सन्नाटो में गूंजती यादों की आवाज
शिकवा हैं दिल को बस इतना
कुत्ते बहुत भोंक रहे हैं, शायर को लिखने नहीं देते
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तीर तेरे लबों से जो निकलते हैं
हाय!!!! मासूम दिल पर तलवार बन गुजरते हैं
शुक्रिया अदा करो कि अब्बू हो हमारे सनम के
नहीं तो फूल चड़ते इस बरस तुम्हारी कब्र पे

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वो गुजरे हमारी गली से
हमारे मकान में जलजला गया
मुन्सी पालटी का बुलडोज़र
शर्मा जी का मकान गिरा गया

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पानी के नल पर............

किस सितम से परेशान हो
जो बूंद बूंद टपकते हों
गलियां सुनते हो रोज़ इतनी
बेशर्मी से क्यों नहीं बह जाते हों

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जब दूधवाला देर से आता हैं ............

देर करता हैं कम्बक्त जो आने में
देर होती हैं कम्बक्त को बनाने में
देर होती हैं कम्बक्त के आने में
देर होती हैं कम्बक्त के सामने जाने में

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जबां पर ताला लगा हैं जाने किस पल वो बेजुबान समझ लें
शराफत चेहरे पर पोती हैं जाने किस पल वो शरीफ समझ लें
शायरी उनके नाम लिखी हैं जाने किस पल वो दीवाना समझ ले
सेहरा बांधे घोड़ी पर बैठे हैं जाने किस पल वो दूल्हा समझ ले

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6 टिप्‍पणियां:

  1. हा हा हा ये था यशवंत लोहार ( अरे पिक्चर देखी है न ) का हथौडा ....टैण टैनेन
    अजय कुमार झा

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  2. सरकारी नल का यहीं हाल है ऐसे ही टपकते हैं...बढ़िया हास्य...

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  3. मस्त है भई शायरी..कुत्ते भौंकते रहे मगर लिख ही गये. :)

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  4. कुत्ते भौकते रहे और हाथी गुजर गया'
    और अब
    कुत्ते भौकते रहे और पोस्ट लिख डाली'

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