मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

अच्छा व्यक्ति -------- पहली कहानी और मैं बन गया "घोस्ट राईटर" (यशवंत मेहता)

मैं जब 9-10 वर्ष का था तब मैंने अपनी पहली कहानी लिखी थी. मैंने यह कहानी लिखकर मम्मी को दी तो उन्होंने विभागीय पत्रिका में प्रकाशित करने के लिए दे दी. पत्रिका में विभाग के लोगो का साहित्य प्रकाशित होता था सो मम्मी को मजबूरन कहानी में अपना नाम देना पड़ा और मैं बन गया "घोस्ट राईटर". पर बहुत मजा आया जब इस घोस्टपने  के लिए  मुझे २०० रूपये का पारिश्रमिक मिला मम्मी से...........


                                                                  अच्छा  व्यक्ति 

शायद इश्वर ने मानव को कई प्रकार का बनाया हैं. कोई व्यक्ति तो जीवन पर्यंत सुख भोगता हैं तो कोई दुःख भोगता हुआ अपनी जीवन लीला समाप्त करता हैं. अर्थात मानव तो मात्र कटपुतली हैं, परन्तु वह विचार करने के लिए स्वतंत्र  हैं.
मैं उसे नहीं जानता न वह मुझसे परिचित हैं, परन्तु इतना अवश्य जानता हूँ कि वह एक भिखारिन हैं जो दिन भर लालबत्ती पर भिक्षा मांगती हैं. उसकी गोद में लगभग दो-ढाई वर्ष का बालक होता हैं. कुछ लोग दया करके एक दो रूपये दे देते हैं तो कुछ डांट कर भगा देते हैं. वह इस डांट का बिलकुल भी बुरा नहीं मानती क्यूंकि उसे पता हैं कि इस संसार में एक अच्छा मनुष्य हैं तो दस बुरे मनुष्य भी हैं.

आज उसे अच्छे व्यक्तियों ने दर्शन नहीं दिए हैं तो उसे भिक्षा भी नहीं मिली. उसका बालक भूख से परेशान हैं.
"माँ आज खाना नहीं देगी क्या???" बालक प्रश्न कर रहा हैं. बेचारी माँ उत्तर नहीं दे पा रही हैं पर उसे अच्छे व्यक्ति के आने की आशा हैं. पास में ही एक जंगल हैं जहाँ बहुत बन्दर रहते हैं, लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं को पूर्ण करने के लिए उन्हें केले, चने, ब्रेड प्रदान करते हैं तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त कर धन्य हो जातें हैं, परन्तु इन गरीबो की और ध्यान देते ही नहीं. माँ उस और देखती हैं, शायद बन्दर नहीं हैं. चलो कुछ केले मिल ही जायेंगे ,परन्तु प्रयास विफल. अद्खाये केले व छिलकों के अलावा कुछ नहीं. आखिर वह भी तो मानव हैं, जानवर नहीं.

अचानक एक गाड़ी आकर रूकती हैं. एक साहब उसमे से निकलते हैं और पीछे नौकर, नौकर के हाथ में एक बास्केट हैं जिसमे दर्जन भर ब्रेड के पेकेट हैं. बंदरो के नेता का आगमन साथ में पूरी वानर सेना. "जय हनुमान-जय बजरंगबली" का उच्चारण करते हुए साहब उनको ब्रेड प्रदान करते हैं. वानर सेना की टंकी फुल हो जाती हैं. अब वह विश्राम चाहते हैं. साहब उनको प्रणाम करके आगे की ओर प्रस्थान  करते हैं. माँ बालक को खड़ा करके एक पेड़ से लकड़ी तोडती हैं ओर लकड़ी से टीले पर पड़ी ब्रेड के साबुत टुकड़े उठाती हैं.  फिर उन टुकडो को साफ करके बालक को खिलाती हैं ओर खुद भी खाती हैं.

अब बालक शांत हैं क्यूंकि उसकी भूख मिट गयी हैं. माँ उठती हैं ओर फिर काम में लग जाती हैं. मैं सोचता हूँ उसे रोज अच्छे व्यक्ति का इंतजार रहेगा.

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत जल्दी घोस्ट बन गए!
    पढ़कर दुख भी होता है किन्तु सदा गोद का बालक भिखारिन का अपना ही हो यह नहीं होता। बहुधा वे बालक किराए पर भी लिए गए होते हैं, चुराए गए भी होते हैं और जैसा कि हाल ही में बंगलौर में हुआ, एक अच्छे खासे घर का बालक आया १०० रुपए रोज़ के हिसाब से किराए पर एक भिखारिन को दे देती थी और स्वयं आराम से टी वी देखती थी। ये बच्चे दानियों में अपराध बोध या दया का भाव जगाने के लिए होते हैं। सच और झूठ में अन्तर करना कठिन होता है। सो भिक्षा न देना ही उचित है।
    घुघूती बासूती

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  2. घुघूती बासूती जी, बिल्कुल सही कहा आपने
    दिल्ली में भी यही हाल है,
    प्रशासन और पुलिस भी लाख कोशिशो के बावजूद भिखारियों को नहीं रोक पायी,
    ९९% भिखारीयों का तो ये धन्धा है और कई असामाजिक तत्व भी भिखारी के रुप में रहते है
    लोग भी धार्मिक मान्यताओं और भावुकता वश इन्हें २-४ रुपये दे ही देते है,
    ये कथा तो उन १% प्रतिशत के लिये है जिन्हे मजबूरी में भीख मागंनी पडी़.

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  3. फकीरा जी, असली,नकली की पहचान ही तो दुर्लभ है,हाँ आपकी कहानी काफी संवेदनशील है ।

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  4. भावनात्मक कहानी ....है ......आज कल भीख मांगना एक व्यपार हो गया है

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  5. कारुणिक और सच्चाई बयां करती कहानी मगर आप कहानीकार इतनी छोटी सी उम्र में ही हो गये थे, जानकर अच्छा लगा
    बहुत अच्छे से संजोया है आपने शब्दों को

    प्रणाम स्वीकार करें

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