सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

भावनाओ की रेशमी चादर बुनता "हृदय गवाक्ष" छु गया दिल को

आजकल मैं "एय्यार" बन ब्लॉग दुनिया में भटकता रहता हूँयह समय कुछ वैसा ही हैं जब मैं पुस्तकालय मेंसीलन भरे कोनो में पुस्तकें खोजता थाबरसो पूरानी किताबो के पीले पन्ने पलटते हुए जाने समय कैसेगुजरता थावही हाल कईं बार इधर भी हो जाता हैं

ऐसे ही घूमते हुए मिला मुझे "हृदय गवाक्ष"। कवियत्री कंचन सिंह चौहान का यह ब्लॉग जब मैंने पढना शुरू कियातो बस पढता ही चला गयामुझे ऐसा लगा जैसे कंचन जी अपनी अनमोल डायरी ब्लॉग पर प्रकाशित कर रही हैंपढ़ते हुए एक वाक्य मिला जिसने मेरे मनोभाव को सही सिद्ध कर दिया

"दैनिक जागरण में देवेन्द्र शर्मा "इंद्र" की ये कविता तब की है जब मैं वो सब अपनी डायरी में लिखती जो आज ब्लॉग में लिखती हूँ..मुझे पसंद आई तो आप से बाँट रही हूँ..!"

कंचन जी के लेखनी प्रभावशाली हैं और उनके पोस्टो पर आने वाली टिप्पणिया भी इस बात कर प्रमाण हैंजीवनके विभिन्न रूपों को कंचन जी बड़े ही भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती हैंउनकी लिखी गयी पोस्टें पिकासो केअतिसुन्दर चित्रों के समान हैं जिन्हें देखने वाला एकटक ही देखता रहता हैं

कुछ पंक्तियाँ पढ़ी तो मन में उत्साह की नयी लहर दौड़ पड़ीकितना साहस हैं कंचन जी मेंजीवन के मूल्य को उन्होंने कितने सुन्दर तरीके से कह डाला

शरीर का एक अंग कम होने से यदि जीवन इतने परिपूर्ण अर्थों में जी लिया जाये तो कमी अच्छी है। यदि वास्तव में मृत्यु के बाद लेखा जोखा ईश्वर के सामने खुल रहा होगा, तो जीवन भर कमियाँ झेल कर दूसरों की जिंदगी जीने के काबिल बनाने वाला ये व्यक्ति वहाँ के अमीरों में गिना जा रहा होगा।"

अक्सर इन्सान शिकायत करता नजर आता हैंकिस्मत और भगवान् को कोसना उसकी आदत बन जाती हैंउसेदुसरो से जलन होने लगती हैंउसे लगता हैं कि उसके साथ भगवान् अन्याय कर रहें हैं

आप की यह पंक्तियाँ मुझे बहुत अच्छी लगीउन्हें यहाँ पर प्रस्तुत कर रहा हूँ

हर होने के पीछे कितनी बार का ना होना होता है उसका ज़िक्र नही होता...नही किया जाता...!! और नही किया जाता इसका मतलब ये नही कि जो हुआ वो दूसरे के साथ आसानी से हो गया। उसे भी वो चीज़ उतनी ही कठिनाई से मिली है जितनी आपको। बस उसने ढिंढोरा नही पीटना चाहा। उसने नही चाहा कि असफलता पर लोगो की संवेदनाएं मिले। क्यों कि संवेदनाएं १०० में सिर्फ २ ही सच्ची होती है। बाकि औपचारिकता और पीछे उपहास..बस यही होती हैं...!

अक्सर हम कोई सुन्दर गीत सुनते हैं या कोई भावनात्मक कविता पढ़ते हैं तो मन करता हैं कि इससे दुसरो केसाथ बांटा जायेमुझे तो कंचन जी का यह अंदाज़ बहुत पसंद आयायह अंदाज़ भी इतना सुन्दर कि पूछिए मतशब्द नहीं मिल रहें इस अंदाज़ की तारीफ के लिएबस इतना कह पाउँगा कि यु लगा जैसे सागर किनारे मिलेमोतियों को जोड़कर आप माला बनाती हैंआपके ब्लॉग के द्वारा मुझे कई अन्य कवियों के जो कविताये पढने कोमिली उनके लिए मैं आपका आभारी हूँ

आपकी कवितायों में एक जादू हैं जिसकी महक आपके ब्लॉग से आती हैंआपके कोमल मन के गर्भ से जनमलेती सुन्दर रचनाये एक नए संसार का निर्माण करती हैंआपकी कविताओं की एक-एक पंक्ति प्रभावित करकेगयीजो पंक्तियाँ मेरे मन को छु गयी उन्हें यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ

दुनिया को समझ ना पाने पर,
जब जब खुद को समझाती हूँ।
और खुद को समझ ना पाने पर,
खुद प्रश्न चिह्न बन जाती हूँ।


आपकी कविता "वो भला कौन हैं किसकी तलाश बाकी हैं??" की यह पंक्तियाँ मैंने आपके ब्लॉग से चुरा कर अपनेपास रख ली हैं


गिरे हैं इस कदर उठने को जी नही करता,
बहुत हताश कर रही है मेरी साँस मुझे।
बहुत थके हैं कि चलने को जी नही करता,
मगर तलाश मेरी रुकने नही देती मुझे।
गुज़र चुका है सबी कुछ भला बुरा क्या क्या
बड़ी हूँ ढीठ कि अब भी तलाश बाकी है।



आपके ब्लॉग का इतिहास बताता हैं कि आप ब्लॉग पर कम लिखती हैं पर जो भी लिखती हैं वो हज़ार बार, बार-बार पढने का दिल करता हैं। सरस्वती माँ का आपको स्नेह प्राप्त हैं।

वक़्त ऐसा चल रहा हैं इन पंक्तियों में मुझे अपने दिल की बात नजर आ गयी।

अजीब हालातों से गुज़र रहा हूँ,

अपनी ही बातों से मुकर रहा हूँ,
मेरी बातें मेरी बदमिजाज़ी नही
खाली बरतन हूँ अभी भर रहा हूँ


और वहीँ पर एक पर प्रेरणा देता एक और शेर मिला

जो बीता है भुला उसको, जो आगे है सुनहरा है,
नया जज़्बा नसों मे भर, नया आया सवेरा है,
भरोसा ही है इंसाँ का, खुदा को खींच लाया जो,
कहीं वो दूध पीता है,कहीं पत्थर पे उभरा है।

आपको कितना भी धन्यवाद् दू कम होगा।

शब्द शिल्प से अनजान हूँ पर जो भी कहा हैं दिल से कहा हैं। आप प्रेरणा की बहती हुई वो निर्मल नदी हैं जिसके पवन जल की एक घूंट काफी हैं मन में उत्साह की नयी लहर को जगाने के लिए। इश्वर आपके ऊपर असीम स्नेह बरसाए। आपके ब्लॉग पर आकर मुझे जो मिला वो मैं बता नहीं सकता। जीवन के रंगों से आप जो कविताये रचती हैं, वो अनुपम हैं, अनमोल हैं।

एक जगह आपने लिखा " कहाँ पड़ गए इस झक्की के चक्कर में"

दीदी हम तो पड़ गए इस झक्की के चक्कर में।

आपके चरणों में
यशवंत मेहता


5 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही कहा आपने उनकी लेखनी के बारे में। उनकी लेखनी में यूँ ही माता सरस्वती का वास रहे यही मनोकामना है।

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  2. कन्चन जी जो भी लिखती है दिल से लिखती है

    आपकी पोस्ट बहुत बढिया लगी

    -वीनस

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  3. कन्चन के हम पुराने फैन हैं.

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  4. बहुत सही आकलन किया आपने .. उनकी जितनी भी तारीफ की जाए कम होगी !!

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  5. प्रिय यश

    दीदी कह देने से तुमने संबोधन के रास्ते सहज कर दिये।

    आज अचानक सर्फिंग करते हुए यह पोस्ट देखी जिसके बारे में जानकारी नही थी मुझे। जिंदगी आजकल उतारों पर चल रही है इसलिये ब्लॉग जगत से संबंध छूटा हुआ है। शायद इसीलिये ये पोस्ट नही देख पाई।

    जीवन में अचानक कुछ अघटित घतना हो जाने के कारण ब्लॉग से नाता टूटा हुआ है। परंतु इतना सारा स्नेह देख कर खुद को रोक भी ना पाई धन्यवाद देने से। और चूँकि तुम्हारा मेल पता प्रोफाइल पर नही है अतः टिप्पणी में ही देना पड़ा धन्यवाद।

    इतना मान देना तो नही चाहिये था तुम्हे, पर जब दिया है तो बदले में शुभाशीष प्राप्त को।

    सस्नेह
    कंचन

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