बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

...आग लगे इस कमीनी को.....

सुबह से पुराने अखबारों में घुसा पड़ा थाइस बीच लिखने वाला कीड़ा दिमाग में उछलने लगाअब क्या लिखाजाये??
दिमाग-मन-दिल की बैठक में विचार-विमर्श चल रहा थादिल ने अपनी बात रखीएक कविता लिखी जाएँदिमाग बोला, बंधू बिना कारण कविता नहीं लिखी जाएगी, अभी तुम्हे दर्द भी नहीं कोईदिमाग ने फाइल मन केपास खिसका दीमन बोला --- अरे पूरानी कविताओ में से एक उठा कर ठेल दो ब्लॉग परकोई पढ़े या पढ़े, टिप्पणी करे या करे, कम से कम लेखनी का कीड़ा तो शांत हो जायेगादिमाग भी सहमत हो गया

तीनो ने मिलकर प्रस्ताव पारित करा और सिग्नल भेज दिएहमने 50-60 कविताये एक पेन ड्राइव में रखी हुईथीपिछले साल में जितना भी कबाड़ लिखा था सब उसी पेन ड्राइव में डाल कर रखा हुआ थाउस पेन ड्राइव कोसंगणक में लगाया तो देखा कविताओ वाला फोल्डर नजर नहीं रहा थादो-चार तरकीबे और लगायी परन्तु सबकुछ निष्फल

पिछले एक साल में जितना भी कबाड़ लिखा थासब गायबतब से दिल-दिमाग-मन तीनो एक कोने में पस्त पड़े हैंटेक्नोलोजी का यह धोखाविश्वास की हत्याआखिर कहाँ गयी गायब हो कर
अरे आग लगे इस कमीनी पेन ड्राइव को.........अब क्या करे ,टाल देते हैंकिस्मत में होगा तो और लिख देंगेकिसी और के लिए कबाड़ हो पर इस कबाड़ी को तो प्यारा था अपना कबाड़पूरा गोदाम ही जल गया

अब संगणक पर कविताये नहीं लिखेंगेपन्नो पर लिख कर जमा कर लेना ही बेहतर हैं

1 टिप्पणी:

  1. कविता का तो ऐसा है कि ५०-६० तो इन्सान न झेल पाये एक बार में..फिर वो तो बेचारी पेन ड्राईव है. :)


    वैसे बड़ा दुख हुआ कि सब गुम हो गईं..पूरे साल की मेहनत पर पानी फिर गया. आपके दुख में शरीक जानिये.

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