बुधवार, 10 मार्च 2010

अजनबी

अनजानी डगर पर मिला था "अजनबी"
दिल तोड़ गया आज शाम को

शिकयत करें भी अगर हम उसकी
जुबान पर लायें किस नाम को

शर्म कहाँ बची हैं "दिल्ली वाले" में
चांदनी चौक में बेच कर आ गया

मुर्ख प्राणी भटकता भावुकता लिए अन्धकार में
"अजनबी" सीने पर गरम लोहा चिपका गया

हाय हाय करता जब जाता था "अजनबी" के पास
जख्मों पर मरहम वो लगता था

गया अब किस डगर पर "अजनबी"
"दिल्ली वाले" पूछे....मेरा "नबी" कहाँ गया

3 टिप्‍पणियां:

  1. मुर्ख प्राणी भटकता भावुकता लिए अन्धकार में
    "अजनबी" सीने पर गरम लोहा चिपका गया

    bahut khub yaswant..

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  2. ajanbi aisa nahi karte. ajnabi ki bajaye apna hi jyada uchit hai nice

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  3. गया अब किस डगर पर "अजनबी"
    "दिल्ली वाले" पूछे....मेरा "नबी" कहाँ गया
    अरे कुछ समझी नही कहीं पे निगाहें कही पे निशाना लग रहा है। कविता के माध्यम से किसे सुना रहे हो?????? शुभकामनायें

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