मंगलवार, 16 मार्च 2010

.......यादें स्कूल की जो आज भी ताजा हैं .......( यशवंत मेहता "फ़कीरा")

हर विद्यार्थी को अपने विद्यालय से लगाव होता हैं और जब वो अपनी शिक्षा पूरी कर विद्यालय छोड़ता हैं तो यह लगाव प्रेम में बदल जाता हैं. वो शिक्षको की डांट-फटकार जिसके कारण विद्यार्थी जीवन में आसूं निकल आते थें वही डांट-फटकार मीठी लगने लगती हैं. दोस्तों के टिफिन के खाने की खुशबु भी नहीं भूली जाती. वो ज़िन्दगी के पन्ने जो हम पढ़ चुके होते हैं उन्हें दुबारा पढने का मन करता हैं.
                             भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम साहब  हमारे स्कूल के छात्रों-छात्राओ  के साथ
काश!!! मैं दुबारा से १२-१३ साल का हो जाऊ और अपने विद्यालय के मैदान में फिर से दौड़ लगाऊ. बहुत दिनों से विद्यालय जाने का मन हो रहा हैं. बस्ता भी निकल लिया हैं. पूरानी किताबे जिनके पन्ने अब पीले हो चुके हैं उनको बस्ते में फिर से सजा लिया हैं. एक पूरानी ज़ोमेट्री जिसका आकर मोबाइल जैसा हैं उसमे रबड़, पेंसिल. पेन, प्रकार भी डाल लिए हैं. दो कापियां भी रख ली हैं जिनमे पहला पन्ना भगवान् के लिए छोड़ दिया हैं. दूसरे पन्ने पर कुछ बढ़िया कहावते लिख दी हैं. एक कार्ड पर विद्यालय का टाइम टेबल भी लिख लिया हैं. 

क्या यह सच हो सकता हैं?? दुबारा से पीछे के मैदान में दो नीम के पेड़ो की ठंडी छाव में बैठकर टिफिन खा सकता हूँ. टिफिन खाने के बाद किसी दुश्मन को पीटने के लिए पकड़ सकता हूँ???. क्या मुझे फिर से कोई खाली क्लास मिल सकती हैं जिसके किसी कोने में किसी डेस्क के नीचे में छुप जाऊ और पूरा पीरियड गोल कर दू.??? क्या मुझे दुबारा से लिब्ररी में बैठने का मौका मिला सकता हैं जहाँ पर मैं बुड्ढ़े बाबा को चिड़ा सकूँ???. वो रंगीन किताबे और जानवरों के चित्र जिन पर मैं अपने दोस्तों से घंटो बहस कर सकूँ???. किसी का कोई नया नाम रखकर उसे चिड़ा सकूँ???. 

सच हैं यह कि उन दिनों को वापस नहीं लाया जा सकता. फिर से आधी छुट्टी के बाद शेखर की दुकान की तरफ नहीं भाग सकता. भाई जान की दुकान से पेन-पेंसिल कॉपी नहीं खरीद सकता. मदर डेरी वाले से बहस नहीं कर सकता. अब तो शेखर की दुकान के समोसे और छोले खाए जमाना बीत गया. पेट्रोल पम्प के अन्दर लगी ठन्डे पानी की मशीन के आगे लाइन लगी लाइन का हिस्सा बनू भी तो कैसे???

आजकल कोशिश कर रहा हूँ कि उन यादों को फिर से ताजा करूँ. फिर से दूर दिख रहे राष्ट्रपति भवन के गुम्बद को देखूं. या जा कर चीकू गार्डन में खड़े पेड़ो पर पत्थर चला कर वो फल तोडू जिसका नाम में आज तक नहीं पता लगा पाया पर उसका स्वाद अभी भी जबान पर जिंदा हैं. आधी छुट्टी भी नहीं हो रही जो मैं जाकर चिल्ड्रेन पार्क में झुला झूल लू या फिर नेहरु तारामंडल चला जाऊ. बंगला साहिब के जाकर मत्था टेक लू और सरोवर में तैर रही रंगीन मछलियाँ देखू. कुछ देर वहीँ खड़ा रहू और दोस्तों के साथ अटखेलियाँ करूँ. फिर लंगर खाने बैठ जाऊ और गरम-गरम रोटी खाऊ. स्कूल तो ना जा सकूँ वापस शायद पर बंगला साहिब जा सकता हूँ और माथा टेक कर फिर से मछलियों को निहार सकता हूँ. लंगर भी खा लूँगा. लंगर खा कर मिलता हूँ.
                                                                                                              
  राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल हमारे विद्यालय में वृक्षारोपण करते हुए 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. स्कुल की याद तो स्कुल छोड़ने के बाद आती है।
    अगर दुबारा जाकर देखो तो स्कुल वही रहता है,
    लेकिन वैसा अहसास नही होता जिन दिनो हम
    उसका एक अंग थे। कैसी विडम्बना है?
    आपके स्मरण मे सहभागी बने।
    धन्यवाद,
    नव विक्रमी संवत की हार्दिक बधाई।

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