शनिवार, 6 मार्च 2010

दोषी कौन ---- खुद ही पता लगा ले (यशवंत मेहता )

बहस, वाद-विवाद करना कोई बड़ी बात नहीं हैं. मुद्दा होना चाहिए बस, महफ़िल जम जाती हैं. अक्सर दिल्ली की बसों में लोग बहस करते मिल जातें हैं. बहस सुनो तो ऐसा लगता हैं मानो सभी के विचार एक हैं. विचार तो एक हैं पर आचरण अलग-अलग हैं. आचरण एक हो तो ही समाज को दिशा मिलेगी नहीं तो बस बहस ही करते रहेंगे.

दो साल पहले की बात हैं. नयी दिल्ली स्टेशन पर अपने रिश्तेदार को छोड़ने गया था. नयी दिल्ली से ही बस बनकर चलती हैं तो बस में जाकर बैठ गया. इधर कुछ लोग जो शाम को अपने काम-धंधे से छुटकर आ रहे थे वो भी धीरे-धीरे बस की सीटों पर प्रकट होने लगें. ७२ सीटों वाली बस में १७२ हो गए थे. सड़क के दूसरी तरफ खड़ा होकर ड्राईवर बीड़ी फूंक रहा था. कंडक्टर ने आवाज लगा दी ---- चाल रे, अगली वाली का टेम हो गया से......

इक महाशय बैठकर तम्बाकू कूट रहे थे. तालियाँ मारते-मारते उनकी नजर बाहर चली गयी. अब उन्होंने ऐसा क्या देखा, यह तो वही जाने. बोलते --- आजकल लड़कियों को कपडे पहनने का ढंग नहीं हैं. उनका यह बोलना था कि बस आगे-पीछे की सीट वाले सब शुरू हो गए. इन्ही के बीच एक महाशय ऐसे थे जो बड़ा अच्छा बोल रहे थे. पता लग रहा था की जनाब न्यूज़ पेपर और न्यूज़ चैनल दोनों के शौक़ीन हैं. इन महाशय की बातों में आदर्शवाद, संस्कृति कूट कूट कर भरी हुई थी.

अब अपना तो स्टैंड आ गया था. अपन तो इनकी बातें ही सुनते रहे रास्ते भर. यह महाशय भी उसी जगह उतरे जहाँ मुझे उतरना था. मेरे से दो कदम ही आगे थे की इन्हें कोई जान-पहचान वाला मिल गया. दोनों फुसफुसाने लगे. इनकी बातचीत मुझे साफ़ सुनाई दे रही थी. जान-पहचान वाला बोला  ---- आपके मकान में नए किरायेदार आयें हैं. यह जनाब बोले ---- हाँ, ३ लड़कियां हैं, कॉल सेंटर में काम करती हैं और मस्त-मस्त कपडे पहनती हैं, ऑंखें सेकने में बड़ा मजा आता हैं.

यह लो हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और.........

कल रात को ही एक घटना और हुई. मैंने १०:२० पर  मेट्रो ली. मेरे सामने वाली सीट पर एक लड़की आकर बैठी. उसने सुट-सलवार पहन रखा था. पहनावा बहुत साधारण था.हाथ में रंगी हुई मेहँदी और चुडा बता रहे थे कि वो नवविवाहित हैं.  कुछ सेकंड बाद एक लड़का पीछे वाले कोच से चलकर आया. मेट्रो खाली थी. उसने एक बार उस लड़की की तरफ देखा फिर ठीक उसके सामने वाली सीट पकड़ ली. पहले तो घूर-घूर कर लड़की को देखने लगा फिर कभी अपनी छाती पर हाथ फेरने लगा कभी अपनी जांघ पर. बेचारी क्या करती, उसकी आँखों में गुस्सा तो था पर उसने अपना ध्यान अपने मोबाइल में लगा लिया.

दोष लड़की के पहनावे का नहीं, दोष उस लड़के की सोच का हैं. वो किसी भी लड़की को छेड़ सकता हैं चाहे उसने सुट-सलवार पहन रखा हो, चाहे जींस-पेंट. फैशन से प्रभावित कुछ कपडे ऐसे होते हैं जिन्हें सार्वजनिक जगहों पर नहीं पहना जा सकता. ९९ प्रतिशत लड़कियां ऐसे कपड़ो को खुद ही नकार देती हैं. छेड़ने वाले इन मनचलों की हरकतों का दोष लड़कियों पर नहीं लगाया जा सकता. दोषी तो यह मनचले हैं जो कि कुंठित हैं और अपनी कुंठा को लड़कियों पर गंदे फिकरे कस के या फिर उनके साथ उलजलूल हरकते करके निकालते हैं. 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बस आधुनिकता में सब डूबे है..और कुछ नही

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  2. दोष उस लड़के की सोच का हैं........

    sahmat....

    bahut achchi lagi yeh post...

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  3. और ऐसे दोषियों को तो जूते मारने चाहिये, हमने बहुत मारे हैं... :)

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  4. पूर्णत: सहमति
    बिल्कुल सही बात कही है जी आपने

    प्रणाम

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