गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

शायरी नहीं आती..

ये ठीक है की हमें शायरी कर नहीं आती,
बातें हो जाती हैं पे बात कर नहीं आती..!!

यूँ ही निकल पड़ते हैं कुछ लफ्ज़ बेसाख्ता,
मौज है उनकी और मौज कर नहीं आती..!!

मक्ता वजनी नहीं और काफ़िया है तंग,
तंगदिली की पतंग कर नहीं आती..!!

अश्यार हैं बुझे-बुझे और ग़ज़ल है मायूस,
मायुसों को युसुफी कर नहीं आती..!!

सुखन नाफ़हम-ए-मीर और बयां से शर्मसार हैं ग़ालिब,
'मनीष' हैं और गालिबन बेखुदी कर नहीं आती..!!

4 टिप्‍पणियां:

  1. सुखन नाफ़हम-ए-मीर और बयां से शर्मसार हैं ग़ालिब,
    'मनीष' हैं और गालिबन बेखुदी कर नहीं आती..!!


    bahut khub

    http://kavyawani.blogspot.com/
    shekhar kumawat

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  2. पर ये तो बहुत अच्छी रही ... क्या बात है शेरों में ...

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