शुक्रवार, 14 मई 2010

शीशा और लोहा ------ चार मुक्तक ----- यशवन्त मेहता "यश"

मुक्तक  १


शीशे के सपने मत सजाओ
पल भर में चूर हो जायेंगे
लोहे के सपने सजाओ
तूफानों में भी टूट न पाएंगे


मुक्तक २
मुकाम हासिल उन्हें ही होते हैं
लोहे के सपने जो सजोते  हैं
वो अपनी किस्मत पर रोते हैं
शीशे के सपने जो सजोते हैं


मुक्तक ३
शीशे के घर में नहीं रहते
जो पत्थरों से डरेंगे
लोहे का आशियाना हैं हमारा
ये पत्थर क्या असर करेंगे


मुक्तक ४
न जाने रोज कितने शीशे इज्जत के
इन बाजारों में उछाले जाते हैं
लोहे के आंसू रोता हैं ख़ुदा
जब कमसिन बदन मंडियों में बेचे जातें हैं

4 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. बढिया अभिव्यक्ति है जी

    प्रणाम स्वीकार करें
    "कमसिन" शब्द नहीं जंच रहा

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