बुधवार, 19 मई 2010

वाह क्या फतवा हैं......शुभानाल्लाह

आज सुबह अख़बार आया! मैंने नींद भरी आँखों से खबरों पर नजर डालनी शुरू करी! मुख्य पृष्ट पर ही एक खबर छपी हैं ---- एक फतवा लडकियों की शिक्षा के नाम!! "फतवा" शब्द बहुत चर्चा में रहता हैं! नए नए फतवे निकलते रहते हैं! फतवों का विरोध भी होता हैं! मीडिया में तो कई फतवों पर लम्बी चौड़ी बहस भी होती रहती हैं!

ये ताजातरीन फतवा दारुल उलूम फरंगी महल ने जारी किया हैं! फतवे ने बहुत सारी अच्छी बातें कही हैं

१. हर मुस्लिम के लिए शिक्षा अनिवार्य हैं चाहे वो पुरुष हो या महिला!

२. इन्सान दुनिया में ज्ञान फ़ैलाने के लिए आया हैं!

३. बेटियों और बहनों को तालीम दिलाने वाले शख्स को जन्नत नसीब होती हैं!

४. इस्लाम में महिलाओ की शिक्षा पर जोर दिया गया हैं और हर मुसलमान को अपनी बेटी की शिक्षा किसी भी कीमत पर सुनिश्चित करनी चाहिए!

५. क्यूंकि माँ औलाद के सबसे नजदीक होती हैं इसलिए उसे तालीम देना जरुरी हैं

उलूम कहता हैं की मुसलमानों की ख़राब हालत की वजह हैं तालीम की कमी होना!

कितना सुन्दर और सार्थक फतवा हैं! आशा हैं की इस फतवे से एक बदलाव आयेगा और मुसलमानों में साक्षरता दर बढेगी!
मीडिया यू तो उलजलूल फतवों पर बहस  करवाता हैं अब उसे भी एक सार्थक पहल करनी होगी. इस सुन्दर फतवे को प्रचारित करना होगा! यह फतवा मात्र मुसलमानों के लिए नहीं हैं बल्कि समाज के उन सभी वर्गों के लिए भी  जरुरी सन्देश  हैं जो अपनी लड़कियों की शिक्षा पर ध्यान नहीं देते!

इतना सुन्दर फतवा देख कर आप भी यही कहेंगे न ----  वाह क्या फतवा हैं......शुभानाल्लाह

11 टिप्‍पणियां:

  1. यह फ़तवा अच्छा तो लग रहा है पर उस इस्लाम और शरीयत के प्रतिकूल है अतः इसका विरोध होना स्वाभाविक है, जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान में तालिबानियों ने दिखाया था.
    उन्होंने लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगाई थी और पूरे विश्व में अधिकतर मुसलमान लड़कियों को पढ़ने से रोका जाता ज=है क्योंकि वे मुसलमान हैं.

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  2. बढ़िया पोस्ट.

    @ E-Guru Rajeev
    राजीव जी, आप जिस तथाकथित तालिबानी इस्लाम की बात कर रहे हैं, अगर इस्लाम की रौशनी में देखा जाए तो वह इस्लामिक कानून नहीं अपितु इस्लाम का बेडा गर्क करने की कोशिशें हैं. और आज इन जैसे संगठनो की कोशिशों की वजह से ही इस्लाम को वह लोग भी संदेह की निगाह से देखने लगें हैं जो की पहले ऐसे नहीं थे.

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  3. वैसे कोई भी फतवा किसी भी आलिम (Islamic Scholar) की अपनी स्वयं की राय नहीं होता है, बल्कि इस्लामिक कानून के अनुरूप सलाह होता है.

    अगर कोई अपनी राय के अनुरूप फतवा देता है, तो फिर वह फतवा नहीं रह जाता और उसको मानना इस्लाम के खिलाफ होता है.

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  4. बढ़िया ...साइड में ब्लैक रंग की वजह से पढ़ने में भुत प्रॉब्लम हो रही है.

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  5. बहुत बढ़िया भईया , अच्चा है ।

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  6. @E-guru Rajeev


    फतवा हदीस और शरिया के हवाले से दिया गया हैं! दारुल उलूम फरंगी महल ने कहा हैं कि इस्लाम महिलाओ की शिक्षा पर जोर देता हैं! फतवा इस्लाम के अनुकूल हैं! खबर नवभारत दिल्ली संस्करण के मुख्य पृष्ट पर हैं!

    शाहनवाज भाई की बात को जरा ध्यान से पढ़े!

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  7. बहुत सुंदर बात, शायद पहली बार ऎसा अच्छा फ़तवा आया है

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  8. राजीब जी से सहमत
    यह फ़तवा अच्छा तो लग रहा है पर उस इस्लाम और शरीयत के प्रतिकूल है अतः इसका विरोध होना स्वाभाविक है, जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान में तालिबानियों ने दिखाया था.
    उन्होंने लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगाई थी और पूरे विश्व में अधिकतर मुसलमान लड़कियों को पढ़ने से रोका जाता ज=है क्योंकि वे मुसलमान हैं.

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  9. @यशवंत जी आपने इस फ़तवे को सामने लाकर एक सार्थक पहल की है आपकी ये कोशिश काबिल ए तारीफ है । आजकल मीडिया मुद्दे की तलाश मे किसी भी पुराने फ़तवे को लाकर उस पर गलत विवाद खड़ा करते है

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  10. पहली बार ऎसा अच्छा फ़तवा आया है

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