रविवार, 1 अगस्त 2010

शौक था जो यार के कूचे हमें लाया था -- आज याद आये बहुत तुम दोस्त

मीर ने फ़रमाया 

शौक था जो यार के कूचे हमें लाया था , मीर 
पांव में ताकत कहाँ इतनी, कि अब घर जाइये

दोस्ती एक ऐसा रिश्ता हैं जिसे ख़ुदा ने सभी रिश्तो से अलग रखा ! कभी लोग बरसो साथ रहकर भी दोस्त नही बन पाते , कभी कुछ पलो का साथ गहरी दोस्ती में बदल जाता हैं ! दोस्ती किसे होगी, कब होगी , क्यों होगी , ये कोई नहीं जानता ! दरअसल दोस्ती सामाजिक , आर्थिक सभी स्थितियों को  नकार कर देती हैं ! दोस्तों के बीच होने वाली टकराहट दोस्ती को और मजबूत बना देती हैं ! अगर टकराहट से दो व्यक्तियों के बीच के सम्बन्ध हमेशा के लिए बिगड़ जाये तो समझ लेना चाहिए कि उनके बीच कभी दोस्ती थी ही नहीं, वो तो मात्र एक ऐसा रिश्ता था जो सामाजिक और आर्थिक मजबूरियों के कारण ढोया जा रहा था ! 


मेरे स्कूल के दिनों की बात हैं! हम क्रिकेट खेल रहे थे! एक शोट सीधे एक सिनिअर लड़के के जाकर लगा , वो लड़का उसी दिशा में बैठा हुआ था , जिस दिशा में मैं फील्डिंग कर रहा था, सो गेंद लेने के लिए मैं उसके पास गया! शोट सीधे उसकी पीठ पर लगा था, इसलिए वो गुस्से से भरा हुआ था ! मैंने उससे गेंद मांगी तो उसने मुझे थप्पड़ रसीद कर दिया ! हमारे और उस सिनिअर के बीच ५-६ कक्षा का अंतर था! थप्पड़ की धमक से मेरे साथी भी सहम गये और मेरे आंसुओं की नदी बह निकली! मुझे थप्पड़ से ज्यादा इस बात ने रुला दिया कि अगर इस स्कूल में मेरा बड़ा  भाई  पढता  होता  तो उस लड़के की मुझे चुने  की हिम्मत न होती !

इस बीच आधी छुट्टी हो गयी, मैं लगातार रो रहा था, मेरे एक -दो साथी मुझे चुप करने पर लगे हुए थे ! तभी एक  सिनिअर लड़का मेरी तरफ आया, उसने मुझसे रोने का कारण पुछा! जब मैंने उसे बताया तो उसने प्यार से मेरे सर पर हाथ फेर दिया और मुझे गोद में उठा लिया! मैं उसे नही जानता था! उस दिन उसने मेरे लंच बॉक्स से एक रोटी भी खायी! उसने मुझे आश्वासन दिया कि वो थप्पड़ मारने वाले सिनिअर का इलाज कर देगा! 


एक दो हफ्ते बाद, स्कूल के मैदान में लडको का झुण्ड गोल घेरा बनाकर खड़ा हुआ था, इसका मतलब होता था कि कोई लड़ाई चल रही हैं! उत्सुकतावश मैं भी उस झुण्ड में घुस कर लड़ाई देखने लगा, मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, मुझे थप्पड़ मरने वाले लड़के की धुनाई हो रही थी, बताने की जरुरत नही कि धुनाई कौन कर रहा था ! जब धुनाई खत्म हुई तो मेरे दोस्त ने मुझे आंख मारी और बोला -- लिटा दिया न!!! 

मैं उसका नाम भूल चुका हूँ पर उसकी शक्ल, चाल-ढाल और बोलने का तरीका मुझे अभी तक याद हैं!! वो मुझे ज्यादातर आधी छुट्टी के समय ही मिला करता था!! उसके साथ रहने का फायदा था कि मुझे स्कूल में कोई छेड़ नही सकता था ! वो अक्सर मेरे लंच बॉक्स से एक -आध रोटी खा लेता था !! वो क्लास्सेस बंक करता था और स्कूल के पीछे जंगल से जामुन- शेहतुत, बेल पत्थर और दूसरे फल तोड़ कर लता था! अब इस जामुन-शेहतुत के भंडार में मेरा भी हिस्सा था जो मुझे बिना जंगल जाये मिल जाया करता था! कई बार मैं पन्नी में ठंडा पानी भरके अगले चार पेरिओड्स तक जामुन को रख देता था और पूरी छुट्टी के समय खाता था!! 


एक दो साल में वो स्कूल पास करके चला गया  और मैं भी अपनी दुनिया में व्यस्त हो गया! आज वो कहाँ हैं, क्या कर रहा हैं, मैं नही जानता!! स्कूल में उसने एक बड़े भाई के रूप में कुछ समय तक मुझसे दोस्ती निभाई! इस दोस्ती में न कोई लालच था, न कोई बंधन!! बस था तो उसका स्नेह जो उन दिनों मुझ पर खूब बरसा! 


Happy friendship day 




2 टिप्‍पणियां:

  1. लेकिन यह तो दादा गिरी हुयी ना....:), बहुत सुंदर लगा आप लगी आप की यह दोस्ती

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