मंगलवार, 20 अगस्त 2013

हवाओं के रुख बदलते ही

हवाओं के रुख बदलते ही
मौसमो का मिज़ाज बदल जाता हैं

जवानी के रंग बदलते ही
मजनू का ठिकाना बदल जाता हैं

ख़ाकगारों की जेब सिलते ही
फकीरी का लिबास बदल जाता हैं

सवाल का जवाब बदलते ही
 इंसान का ईमान बदल जाता हैं

रात के तारे बदलते ही
सुबह का आसमान बदल जाता हैं

बादशाह  के बदलते ही
चमचो का अंदाज बदल जाता हैं

फ़क्र किस बात का है तुझे
यहाँ सबकुछ बदल जाता हैं





दिल्ली में अब की आकर

दिल्ली में अब की आकर, उन यारों को न देखा
कुछ वे गए शिताबी, कुछ हम भी देर आये


शनिवार, 3 मार्च 2012

दर्द .........

बाहर बालकनी में .........
.....सिगरेट के छल्लो में....
.....काली चाय के घूंटो में....

.....दर्द को भुला देता हूँ मैं.....


अन्दर कमरे में......
.....ऐशट्रे में अधजली सिगरेट बुझाते हुए.....
.....खाली कप टेबल पर रखते हुए....

....दर्द रुला देता हैं मुझे.........